लघु कथा
दया
योर आनर.............. यह शख्स जो आज कटघरे में खड़ा मासूम नजर आ रहा है, यह इंसान नहीं दरिन्दा है, इंसान के नाम पर कलंक है इसने एक मासूम युवती के साथ अपना मुंह काला किया।
मजबूरियों का फायदा उठाने वाला यह वासना का पुजारी दया का पात्र नहीं, इसे धरा 376 के तहत कम से कम उम्र कैद की सजा अवश्य दी जाये, यही आपसे गुजारिश है, यही न्याय है।
व्कील साहब बहस समाप्त करके अदालत से निकलकर अपने टिन रोड आफिस में पधारे। दूसरे मुकदमें की फाइल में उलझ गये। नितांत अकेले थे इस समय वे।
अचानक उनका ध्यान बंटा। एक नौजवान भिखारिन गोद में एक बच्चा लिये कह रही थी-‘ वकील साहब बच्चे को भूख लगी है, कुछ दे दीजिए’।
वकील साहब भिखारिन को ऊपर से नीचे तक निरीक्षण करते हुए बोले- ‘‘ भूख तो मुझे भी लगी है।’’
‘‘दया कीजिए वकील साहब बस, दो रू.....................’’।
मैने कहा न मुझे भी भूख है, तभी तो दया कर रहा हॅू। मेरी भूख मिटा दो। एक, दो क्या सीधे बीस दूंगा। ये देख 20 रू.......................’।
भिखारन ने एक बार गोद में लिये अपने बच्चे को देखा। फिर अपने कांपते हाथ से 20 रूपये का नोट थाम लिया।

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