Friday, 20 January 2012

विचार- मंथन



समाज को काहिल बना रही भिक्षावृत्ति
भारत में आदि काल से ही दान करने की परंपरा चली आ रही है दान मांगने पर कई दानवीरों ने अपने प्राण तक दान दे दिये जैसे कर्ण, महर्षि दधिची,बलि ,रघु, शिव और हरिश्चन्द। इन लोगों का नाम आज भी हमारे देश में आदर व सम्मान के साथ लिया जाता है। आज और कल के दान देने में काफी परिवर्तन हो गया है पहले के समय में कोई प्रजा अपनी राजा से दान मांग लेता था या राजा द्वारा प्रजा को दान दे दिया जाता था या संकट की घड़ी में जीवन दान भी दे दिया जाता था। लेकिन आज के समय में यह धीरे-धीरे एक व्यवसाय का रूप अख्तियार करती जा रही हैै। आप मंदिरो या रेलवे स्टेशन अथवा ट्रेन में ऐसे तमाम लोगों से मिलते हैं जो ना तो अपाहिज होते हैं और नाही भिक्षा पाने के पात्र होते हैं लेकिन फिर भी उनपर किसी प्रकार का बहस न करते हुए आप उन्हे भिक्षा दे देते हैं। कहीं-कहीं तो लंगड़ा व अंधा बनकर बच्चों के सहारे गीत गातें हूए भीखारी पूरी ट्रेन का सफर करते हूए मिल जाते हैं ऐसे में उनके साथ छोटा बच्चा महज चार या पाॅच साल का होता है प्रश्न यह उठता है कि वह अपने साथ उस छोटे बच्चे को भी भिखारी बना दे रहा है। यदि बचपन से किसी बच्चे को ऐसी प्रवृत्ति में पाला जाये तो वह आगे जाकर क्या करेगा इसका अनुमान आप लगा सकते हैं। एक अनुमान के अनुशार केवल भारत देश में 3000 करोड सालाना भिख में लिया व दिया जाता है।
समाजशास्त्रियों ने भिक्षावृत्ति को अपराध माना है। अब यह कानून के उल्लंघन से जुड़ गयी है। भिक्षावृत्ति खासकर बच्चों को काहिल बना रही है तो कुछ बच्चे अपराध का रास्ता पकड़ने को मजबूर हो रहे हैं। विभिन्न बाजारों मुहल्लों व धार्मिक स्थलों पर भिक्षा मांगते महिलाओं, पुरूषों व बच्चों का झुण्ड नजर आता है जिसमें ज्यादातर अपात्र होते हैं। दीन-दुखियों अपाहिजों व अनाथों को दान देने की परम्परा पुण्य लाभ से जोड़ी गयी है। यही परम्परा अब समाज में कोढ़ बनती जा रही है। भिक्षावृत्ति कर आसानी से दाल रोटी चलाने की प्रवृत्ति में कुछ महिलाओं व बच्चों में यह रास्ता अख्तियार करने में सहयोग किया है। दया भाव व पुण्य लाभ के चलते लोग भिखमंगों को दरवाजे से खाली हाथ नहीं जाने देना चाहते। लोगों की इस कमजोरी का फायदा कपितय पेशेवर भिखारी उठा रहे हैं कुछ तो नकली अपाहिज व बहूरूपिया बनकर लोगांे को ठगने का काम करते हैं। दिनों दिन गम्भीर होते जा रहे इस सामाजिक विषय पर रामेश्वर पंचक्रोशी क्षेत्र के पण्डित शारदा प्रसाद पाण्डेय व राधाकृष्ण मंदिर के महंत राममूर्ति उर्फ मद्रासी बाबा ने कहा कि शास्त्र के अनुसार दान करने से धन बढ़ता है एश्वर्य वृद्धि होती है पुण्य मिलता है लेकिन पात्रों को ही दान देना चाहिए। किसी स्वस्थ्य बच्चे व किशोर को दान देना उनके भविष्य व सामाजिक विकास में बाधक बनना है। कानूून विरोधी यह कृत्य सामाजिक रूप से भी एक अनुचित कदम है। हालांकि सभी तीर्थ स्थानों पर यह गलता परंपरा हावी है। माॅ बा पके साथ दूधमूहें बच्चे को भी दिखाकर पैसा मागने का काम किया जा रहा है। विडंबना यह है कि अधिकारी व कानून के रखवाले इस तरफ ध्यान नहीं देते या यह एजेंडा उनकी प्राथमिकता सूची में नहीं है लेकिन इससे धीरे-धीरे समाज में घुन लग रहा हैै।

Sunday, 15 January 2012

कुछ पल के लिये



                   कुछ पल के लिये
सोचता हू कुछ पल के लिये खामोश हो जाऊ मै।
धुधली हूई धूंध सी यादों में खो जाऊ मै। सोचता हू ................. खामोश हो जाऊ मै।
उनको देखता हू तो बोलने की चाहत जाग जाती है।
कोई अपना बड़ी दूरी है और उसकि याद आती है।।
उस अपने पन की यादों के आगोस में खो जाऊ मैं। सोचता हू ................. खामोश हो जाऊ मै।
लाख कस्में वो पल में दिला जाते हैं।
फिर कस्मों को कैसे भुला जाते हैं।।
आखें खुली हो और सपनों में खो जाऊ मैं। सोचता हू ................. खामोश हो जाऊ मै।
दर्द कितना है इस दिल में प्रवीन जानता है।
अस्क सूखे नहीं अभी वो रात दिन जानता है।।
छोड़कर ये दुनिया सरफरोश हो जाऊ मै। सोचता हू ................. खामोश हो जाऊ मै।
माता का प्यार तो बचपन से मिला मुझको।
बीबी का प्यार तो जीवन में मिला मुझकों।।
फटे आचल के टूकड़े में टूटकर सो जाऊ मैं। सोचता हू ................. खामोश हो जाऊ मै।

Saturday, 7 January 2012

जिन्दगी जैसे मेरी बदल ही गई





उनसे एक पल में ऐसे मोहब्बत हुई जिन्दगी जैसे मेरी बदल ही गई।
मै ना सोचा ना समझा कभी भुलकर ये सुलगती हुई आग जल ही गई।।
छूट जाये जहा तो भी गम ना रहे
अश्को से मेरी आखें भी नम ना रहें
चाहे चल जाये जीवन मेरा गम नहीं
मेरी चाहत पर कोई सितम ना रहे
अब दूखों और सुखों में हम कैसे हसें जब ये अश्कों की डोली निकल ही गई।
उनसे एक पल में ऐस मोहब्बत हूई जिन्दगी जैसे मेरी बदल ही गई।।
इस मोहब्बत में ऐसा करम हो गया
जैसे लगता है दिन रात कम हो गया
अब ये रोती हूई आखें हैं पूछती
हम मिले अखिर क्यों क्यों जनम हो गया